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सूखे से खाद्य कीमतें बढ़ीं, भारत इथेनॉल मिश्रण घटा सकता है

उद्योग जानकारों का कहना है कि कम मानसूनी बारिश और मक्का व चीनी की रिकॉर्ड कीमतों के कारण भारतीय पेट्रोल में इथेनॉल की हिस्सेदारी लगभग 15 प्रतिशत रह सकती है।

स्कर्दू टाइम्स डेस्क
सूखे से खाद्य कीमतें बढ़ीं, भारत इथेनॉल मिश्रण घटा सकता है
तस्वीर: The Kathmandu Post

उद्योग जानकारों का कहना है कि एक दशक से अधिक समय में सबसे कम मानसूनी बारिश से खाद्य कीमतें बढ़ने और कच्चे माल की आपूर्ति घटने के बाद भारत पेट्रोल में कम इथेनॉल इस्तेमाल कर सकता है। इस बदलाव से दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक भारत की निर्भरता कच्चे तेल पर और बढ़ सकती है।

कृषि कारोबार कंपनी केएन एग्री रिसोर्सेज के चेयरमैन जी.के. सूद ने द काठमांडू पोस्ट को बताया कि इस महीने शुरू हुए आपूर्ति वर्ष में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल की हिस्सेदारी पिछले वर्ष के 20 प्रतिशत से घटकर लगभग 15 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। चार इथेनॉल उत्पादकों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि मक्का की कीमतों के आधार पर उन्हें 15 से 17 प्रतिशत मिश्रण की उम्मीद है।

भारत सरकार ने 20 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य, जिसे ई20 कहा जाता है, तय समय से लगभग पांच साल पहले हासिल कर लिया था। अखबार के हवाले से सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से इस कार्यक्रम से तेल आयात की लागत में लगभग 2 खरब रुपये (21.1 अरब डॉलर) की बचत हुई है। 20 प्रतिशत की दर पर सालाना बचत 430 अरब रुपये आंकी गई थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मानसून में सामान्य से लगभग 13 प्रतिशत की कमी रही। मक्का और चीनी की कीमतें लगभग 40 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं और चावल की कीमतें 20 प्रतिशत बढ़ीं। खुदरा खाद्य मुद्रास्फीति अगस्त के 5.97 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 7.74 प्रतिशत हो गई।

सूद ने कहा, "भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, इसलिए ईंधन से ज्यादा खाने को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, और सूखे के साल में तो और भी।"

सरकार ने पिछले महीने तेल कंपनियों से कहा था कि नए आपूर्ति सीजन के लिए चीनी आधारित कच्चे माल से बने इथेनॉल की खरीद न करें। द काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने मक्का आधारित इथेनॉल की खरीद कीमत भी 71.86 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 68.86 रुपये प्रति लीटर कर दी। अखबार ने कहा कि सरकार के एक प्रवक्ता ने रॉयटर्स के टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, इथेनॉल उत्पादकों ने क्षमता बढ़ाकर लगभग 20 अरब लीटर सालाना करने के लिए भारी कर्ज लिया है और कम मिश्रण से उनके पास अतिरिक्त क्षमता रह जाएगी। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, मक्का उत्पादन इस साल के रिकॉर्ड 55 मिलियन मीट्रिक टन से 15 प्रतिशत तक घट सकता है।

2027 की शुरुआत में कई राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले खाद्य मुद्रास्फीति राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, जिनमें भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश भी शामिल है। 2024 के आम चुनाव में मोदी की भारतीय जनता पार्टी को वहां नुकसान हुआ था और विपक्षी दलों ने अधिक सीटें जीती थीं।

कुछ वाहन चालकों और वाहन निर्माताओं ने अधिक इथेनॉल मिश्रण से ईंधन दक्षता और इंजन पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई है। सरकार ने कहा है कि उसका अनुपात 20 प्रतिशत से ऊपर बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है।

डीडब्ल्यू ने बताया कि एल नीनो वैश्विक अर्थव्यवस्था में खाद्य और शिपिंग को प्रभावित कर रहा है।

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द काठमांडू पोस्ट ने भारत के इथेनॉल मिश्रण लक्ष्य और उद्योग जानकारों के अनुमानों को प्रमुखता दी, जिनमें जी.के. सूद का लगभग 15 प्रतिशत का आंकड़ा और गुमनाम उत्पादकों का 15 से 17 प्रतिशत का दायरा शामिल था। इसने चीनी आधारित इथेनॉल के खिलाफ सरकार के निर्देश और मक्का इथेनॉल की खरीद कीमत में कटौती की भी खबर दी। डीडब्ल्यू की रिपोर्ट वैश्विक अर्थव्यवस्था में खाद्य और शिपिंग पर एल नीनो के असर पर एक व्यापक व्याख्या के रूप में पेश की गई थी, जिसके शीर्षक या स्टैंडफर्स्ट में भारत से जुड़ा कोई मिश्रण आंकड़ा नहीं था।

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